Category Archives: Deepak Acharya – दीपक आचार्य

गवारफली की आदिवासी औषधीय उपयोग / Tribal medicinal uses of Guar

यह सन्देश दीपक आचार्य का अभुमका हर्बल्स, अहमदाबाद से है. अपने इस सन्देश में दीपकजी हमें गवारफली के पारंपरिक आदिवासी औषधीय उपयोग के बारे में बता रहें है. इनका कहना है कि गवारफली लगभग हर घर में खाई जाने वाली सब्जियों में से एक है. इसकी खेती प्रायः पूरे भारत में की जाती है. गुजरात के डांग आदिवासी गवारफलियों को सुखाकर चटनी तैयार करते है और इसे मधुमेह के रोगियों को 40 दिनों तक खाने को देते है. इनका मानना है कि इसे प्रकार करने से मधुमेह के रोगियों को आराम मिलता है. पातालकोट के आदिवासी मानते है रात भर इन फलियों के बीजों को पानी में भिगोकर फिर इसे पीसकर सूजन, जोड़ों के दर्द और जलन वाले शारीरिक अंगो पर लगाने से लाभ मिलता है. वह यह भी मानते है यदि गवारफली की कच्ची फलियों को चबाकर खाने से मधुमेह के रोगियों को आराम मिलता है. ग्रामीणों का मानना है कि गवारफलियों की कच्ची फलियों को पीसकर उसमे टमाटर, धनिया मिलाकर उससे बनाई चटनी प्रतिदिन खाने से नेत्रज्योति बढती है और चश्मा भी उतर सकता है. गवारफलियों की कच्ची फलियों को उबालकर उस पानी में अपने पैरो को कुछ देर डूबाकर साफ़ करने से कटी-फटी एडियों और बिवाईयों में लाभ मिलता है. दीपक आचार्य का संपर्क है 9824050784

This is a message of Deepak Acharya from Abhumka Herbals, Ahmedabad. In this message he is telling us tribal medicinal uses of Gawarfali well known as Guar inn English. He says Guar is cultivated throughout India. As per Daang tribe of Gujrat giving sauce of dried Guar to diabetic patient is very useful. Tribes of Patalkot believes for getting relief from  irritation, joint pain & swelling apply paste of overnight soaked Guar seeds on affected body parts. They also believes chewing of raw Guar beans is beneficial for diabetic patients. Villagers believes eating sauce of raw Guar beans by adding tomatoes & coriander is useful for improving eye sight. Immersing feet in Guar boiled water for some time is beneficial for getting relief from creaked heals. Deepak Acharya’s at 9824050784

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मैथी की आदिवासी पारंपरिक उपयोगिता / Tribal traditional usages of Fenugreek

यह सन्देश दीपक आचार्य का अभूमका हर्बल्स, अहमदाबाद से है. अपने इस सन्देश में दीपकजी बता रहे है कि किस प्रकार आदिवासी बहुमुत्रता के उपचार के लिए मेथी का प्रयोग करते है. इनका कहना है कि इस रोग के निवारण के लिए मेथी की भाजी का 100 मी.ली रस निकालकर उसमे आधा चम्मच कत्था और इतनी ही मिश्री मिलाकर रोज सुबह खाली पेट एक सप्ताह तक सेवन करने से लाभ मिलता है. एक चम्मच मेथी के बीजों का चूर्ण और एक चम्मच हल्दी को फांक कर पानी पियें. ऐसा करने से मूत्र वेग में कमी आती है. इस उपचार के दौरान तेल, घी, अधिक शक्कर के सेवन से बचें. इसी प्रकार घाव होने पर यदि मेथी के पत्तों का लेप उन घावों पर करके उसपर पट्टी बांध दी जाये तो घाव जल्दी भरते है. मेथी की भाजी के सेवन करने से बुखार में भी लाभ होता है. ऐसी आदिवासी मान्यता है जो व्यक्ति मेथी की भाजी का अधिक मात्रा में सेवन करते है उनके बाल देरी से सफ़ेद होते है. दीपक आचार्य का संपर्क है 9824050784

This is a message of Deepak Acharya from Abhumka Herbals, Ahmedabad. In this message he is telling us traditional tribal usages of Fenugreek. He says as per tribal knowledge extract 100 ml juice of fenugreek leaves add half 100 km  ½ tsp Catechu powder &  ½ tsp Turmeric powder. After mixing taking this combination early morning empty stomach for a week is useful for frequent urination patients. Taking 1 spoon Fenugreek powder after adding Turmeric powder in equal ratio with water can reduces urine velocity. Oily items & extra sugar should be avoided during treatment. Similarly, applying Fenugreek leaves pastes on cut & wounds is helpful in healing wounds fast. Using Fenugreek as vegetable is useful for curing fever. As per tribal beliefs consumption of Fenugreek in significant amount delays hair grey problem. Deepak Acharya’s 9824050784

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शहतूत के पारंपरिक आदिवासी उपयोगिता / Traditional tribal utility of Mulberry

यह सन्देश दीपक आचार्य का अभूमका हर्बल्स, अहमदाबाद से है. अपने इस सन्देश में दीपकजी हमें शहतूत फल की पारंपरिक उपयोगिता के बारे में बता रहे है. इनका कहना है गर्मियाँ शुरू हो चुकी है और जंगलों में अनेक प्रकार के फल बहार पर है. शहतूत भी ऐसा ही जंगली फल है जो न केवल जंगलों में बल्कि सडकों और राजमार्गों के किनारे भी पाया जाता है और जिसके फल गर्मियों में प्रचुरता से उपलब्ध होते है. आदिवासियों के अनुसार शहतूत का रस पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती है और इनका शर्बत भी बनाया जाता है. पातालकोट, मध्यप्रदेश के आदिवासी शहतूत के रस में चीनी मिलकर पीने की सलाह देते है उनका मानना की ऐसा करने से लू से बचाव होता है. शहतूत का रस हृदय रोगियों के लिए काफी लाभदायक होता साथ ही जिन लोगो को ज्यादा प्यास लगने की शिकायत हो उनके लिए भी शहतूत का रस फायदेमंद होता है. शहतूत और नीम की छाल को बराबर मात्र में पीसकर मुंहासों पर लगाने से आदिवासी मानते है इससे मुहांसे ठीक हो जाते है. शहतूत में विटामिन ए, कैल्शियम, फास्फोरस और पोटेशियम जैसे तत्व पाए जाते है. शहतूत के सेवन से बच्चों को न केवल पर्याप्त पोषण प्राप्त होता है बल्कि यह बच्चों के पेट के कृमियों का भी नाश करता है. ऐसा माना जाता है की शहतूत का सेवन रक्तविकारों को नष्ट कर रक्त का शोधन करता है. गुजरात के डांग आदिवासी मानते है कि अगर शरीर के किसी भाग में सूजन हो तो उस पर शहतूत का रस और शहद मिलाकर लगाने से सूजन में राहत मिलती है. जिन्हें पैर के तलुओं में जलन की शिकायत रहती है उन्हें शहतूत का रस पीना चाहिए. दीपक आचार्य का संपर्क है 9824050784

This is a message of Deepak Acharya from Abhumka Herbals, Ahmedabad, Gujrat. In this message he is telling us Tribal traditional usages of Mulberry (Shahtoot). He says summer has started & many kinds of fruits in the forest has come out. Mulberry is a wild fruit. It not only found in the forests but often it is found in the gardens, along the roads & highways. According to tribal belief drinking Mulberry juice improves eyesight. Tribal’s of Patalkot, MP suggests drinking Mulberry juice with sugar they believe that by doing so it is helping to prevent sunstroke. Mulberry juice is beneficial to heart patients and is also helping to control excessive thrust as well. Applying bark paste of Mulberry & Neem tree in equal ratio on acne. Tribal believe by doing so it is useful to healing acne. Mulberry is enriched in vitamin A, calcium, phosphorus & potassium. Intake of Mulberry is not only nutritious for children but it is destroying stomach worms as well. Consumption of Mulberry is purifying blood. As per Daang tribe of Gujrat applying Mulberry juice by adding honey is helping to get rid of inflammation. Deepak Acharya’s at 9824050784

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बेलफल का पारंपरिक औषधीय प्रयोग / Traditional medicinal usages of Bael

यह सन्देश दीपक आचार्य का अभूमका हर्बल्स, अहमदबाद से है. आज दीपकजी हमें बेलफल के पारंपरिक उपयोग के बारे में बता रहें है. इनका कहना है कि गर्मियाँ शुरू हो गयी है और गर्मियों के इस मौसम में बेलफल भी लगभग पकने को है. ग्रामीण अंचलों में बेलफल से पारंपरिक रोगोपचार किये जाते है. दीपकजी हमें बता रहें है की किस प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में आदिवासी कच्चे बेलफल का प्रयोग हाथ-पैरों और तलुओं के जलन को ठीक करने के लिए करते है. इसके लिए 5 कच्चे बेलफल के गुदे को 250 मी.ली नारियल के तेल में एक सप्ताह तक लिए भिगोया जाता है. इसके बाद इसे छानकर इसे जलन वाले स्थानों पर लगाने से आराम मिलता है. ग्रामीण अंचलों के वासी पके हुए बेलफल का शरबत का उपयोग गर्मी से बचने के लिए करते है. इसके शरबत का सेवन गर्मी की तपन और लू से बचाता है. दीपक आचार्य का संपर्क है 9824050784

This is a message of Deepak Acharya from Abhumka Herbals, Ahmedabad. In this message Deepakji is telling us medicinal properties of Bael (Aegle marmelos). He says in rural areas tribal people is using Bael fruit as a remedy of inflammation & burning. For this take pulp of 5 raw Bael fruit and soak this pulp in 250 ml coconut oil for a week. After filtration applying this combination on burn persists areas is very useful. These tribal also using squash of ripen Bael to beat summer stroke. Deepak Acharya’s at 9824050784

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अरहर के औषधीय गुण / Medicinal properties of Pigeon pea

यह सन्देश दीपक आचार्य का अभुमका हर्बल्स, अहमदाबाद से है. अपने इस सन्देश में दीपकजी हमें अरहर की दाल जिसे अरहर भी कहते है के पारंपरिक आदिवासी औषधीय नुस्खों के विषय में बता रहे है. अरहर के पत्तियों और दूब घाँस को पीसकर इसके रस की बूंदे अगर नाक में डाली जाये तो आदिवासी हर्बल जानकारों के अनुसार यह माइग्रेन के असर को कम करता है. गुजरात के डांग आदिवासी मानते है कि अरहर की पत्तियों को पीसकर अगर घावों पर लगाया जाये तो घाव तो जल्दी ठीक होते ही है और उनके पकने की संभावना में कम हो जाती है. दाँतों में दर्द की शिकायत होने पर अरहर की पत्तियाँ को उबालकर उस पानी से कुल्ला करने से दांत दर्द में आराम मिलता है. पातालकोट के आदिवासी मानते है कि अरहर की साबुत छिलकों सहित दाल को भिगोकर उस पानी से कुल्ले करने से मुहँ के छाले ठीक हो जाते है. इन आदिवासियों के अनुसार अरहर की दाल और पत्तियों को पीसकर उसे हल्का गर्म कर यदि प्रसूता के स्तनों पर लगाया जाये तो दूध का परिमाण सामान्य हो जाता है. गुजरात के डांग आदिवासी अरहर की कोमल पत्तियों और डंडियों को दूध देने वाले मवेशियों को खिलाते है उनका मानना है इसे खिलाने से उनकी दूध उत्पादन क्षमता बढ़ जाती है. दीपक आचार्य का संपर्क है: 9824050784

This is a message of Deepak Acharya from Abhumka Herbals, Ahmedabad. In this message he suggesting some tribal medicinal usages of Pigeon pea well known as Tuar or Arhar in Hindi. Make Juice of Arhar & Couch grass by taking in equal parts. As per a tribal beliefs dripping drops of this mixture into nose is useful for reducing impact of Migraine. As par Daang tribe of Gujrat paste of Arhar leaves is useful for curing cuts & wounds. Boil Arhar leaves in water and rinsing mouth using this water is useful in toothache. Soak whole skin Arhar in water. As per tribes of Patalkot rinsing mouth using this water is useful to get rid of mouth ulcers. As per these tribes applying warm paste of Arhar peas & leaves on the breasts of procreative mother can stimulate milk flow. Giving seedlings of Arhar to productive cattle’s is useful for increasing milk production. Deepak Acharya’s 9824050784

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दूब घाँस के पारंपरिक औषधीय प्रयोग / Traditional medicinal usages of Couch grass.

यह सन्देश दीपक आचार्य का अभुमका हर्बल्स, अहमदाबाद से है. अपने इस सन्देश में दीपकजी हमें दूब घाँस के बारे में बता रहे है कि किस प्रकार हमारे आदिवासी भाई इस दूब घाँस का प्रयोग रोगों के उपचार में करते है. दूब घाँस को हिन्दू धर्म शास्त्रों में पवित्र माना गया है और प्रत्येक शुभ-कार्यों और पूजा में इसका प्रयोग किया जाता है. दूब घाँस खेल के मैदान, मंदिर परिसरों, बाग-बगीचों और खेतों में पाई जाती है और यह एक अत्यंत सामान्य घाँस है. आदिवासियों का मानना है कि प्रतिदिन दूब घाँस का सेवन करने से शारीरिक स्फूर्ति बनी रहती है. आधुनिक विज्ञान के मतानुसार दूब घाँस में विभिन्न प्रकार के रसायन पाए जाते है जो हमारे शरीर के लिए लाभदायक होते है. दूब घाँस का लेप मस्तक पर लगाने से नकसीर में लाभ मिलता है. पातालकोट के आदिवासी नाक से खून आने पर ताज़ी दूब घाँस के रस की 2-2 बूंदे नाक में डालते है जिससे नाक से खून आना बंद हो जाता है. इसी तरह गुजरात के डांग आदिवासी मानते है कि अगर दूब घाँस को पानी में मसलकर उसे छान कर उसमे मिश्री मिलाकर रोज पीने से गुर्दे की पथरी गल कर निकल जाती है. पातालकोट के आदिवासी मानते है की उल्टियाँ होने के दशा में अगर दूब घाँस के रस में मिश्री मिलाकर पीने से लाभ मिलता है. दीपकजी का संपर्क है: 9824050784

This is a message of Deepak Acharya from Abhumka Herbals, Ahmedabad. In this message he is telling us traditional tribal usages of Couch grass commonly known as Doob. This grass is considered as sacred in Hindu mythology and commonly used in every worship. This grass is commonly found in open fields & gardens. Tribal’s believe by regular consuming of this grass physical elation persists. As per modern science this grass contains many chemicals which are beneficial for our body. As per tribal of Patalkot pouring 2-2 drops fresh juice of this grass can be useful to cure nose bleeding. In case of vomiting mixture of couch grass juice & sugar candy can be useful. Daang tribe believes by regular drinking mixture of couch grass juice after adding sugar candy in glassful water thaw out kidney stone. Deepak Acharya’s 9824050784

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इमली के वृक्ष की पारंपरिक चिकित्सीय गुण / Traditional medicinal properties of Tamarind

यह सन्देश श्री दीपक आचार्य का अभुमका हर्बल्स, अहमदाबाद से है. इस सन्देश में दीपकजी हमें बता रहे है की कैसे आदिवासी इमली के वृक्ष के विभिन्न अंगो जैसे फुल, पत्तियाँ, छाल और फल का पारंपरिक उपचार विधियों में कैसे उपयोग करते है. इमली के फूलों और पत्तियों को एकत्रित कर उसे समान मात्रा में उबाल कर काढ़ा तैयार किया जाता है. इन फूलों और पत्तियों को चार गुना पानी में एक चौथाई पानी शेष रहने तक उबला जाता है. आदिवासी मानते है की यह काढ़ा पीलिया रोग के उपचार में फायदेमंद होता है इसे रोगी को दिन में दो बार एक सप्ताह तक पिलाने से लाभ मिलता है. भूख न लगने की शिकायत होने पर पकी हुई इमली के गुदे को पानी में मसलकर इसमें थोडा सा काला नमक मिलाकर दिन में दो बार देने से लाभ मिलता है. इसी प्रकार पकी हुई इमली का रस बुखार से ग्रस्त व्यक्ति को देने से बुखार में आराम मिलता है गुजरात के डांग आदिवासी मानते है की इस रस में अगर थोड़ी सी इलायची और खजूर भी मिला दिया जाये तो ज्यादा आराम मिलता है. इसी प्रकार इमली के बीजों को भूनकर उसका चूर्ण 3 ग्राम मात्रा में दस्त के रोगी को देने से आराम मिलता है..दीपकजी का संपर्क है 9824050784

This is a message of Deepak Acharya from Abhumka Herbals, Ahmedabad. In this message Deepakji is telling us traditional tribal usage of different parts of Tamarind tree. Take tamarind flowers & leaves in equal ratio and boil this until quarter water remains. By giving this decoction twice a day for a week can be useful for the treatment of Jaundice. Chafed ripen tamarind with little rock salt can be given to stimulate apatite. Powder of roasted seeds oftamarind can be given in 3 gms quantity for curing Diarrhea. Dang tribe of Gujrat believes juice of ripen tamarind with some cardamom & dates can cure fever. Depakji’s at 9824050784

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पानी को शुद्ध करने की पारंपरिक विधि / Traditional tribal method of water purification

यह सन्देश श्री दीपक आचार्य का अभुमका हर्बल्स, अहमदाबाद, से है. इस सन्देश में दीपकजी हमें बता रहे है की किस प्रकार से पातालकोट, मध्यप्रदेश के आदिवासी पारंपरिक तरीकों से जल का शुद्धिकरण करते है.. पातालकोट घाटी के गाँव की महिलाएँ राजखोह नामक घाटी में स्थित पोखरों से पानी भरती है सामान्यतः गहराई में होने के कारण इन पोखरों का पानी मटमैला होता है. इस पानी में कीचड और अन्य गन्दगियाँ होती है. यहाँ की महिलाएँ इस पानी को शुद्ध करने के लिए निर्गुन्डी नामक वनस्पति की पत्तियों का प्रयोग करतीं  है. पहले घड़े में पानी भर लिया जाता है फिर उसमे लगभग आधे घड़े से थोडा कम जितनी निर्गुन्डी की पत्तियाँ भर दी जाती है. गन्दा पानी पत्तियों के ऊपर फैला होता है. लगभग एक घंटे बाद पानी की सारी गन्दगी घड़े के तल में बैठ जाती है और ऊपर के साफ पानी को निकाल लिया जाता है.. इन आदिवासियों का मानना है की निर्गुन्डी की पत्तियों में मिट्टी और अन्य गन्दगी को आकर्षत करने की क्षमता होती है..जिससे पानी में मौजूद गन्दगी और अन्य सूक्ष्म जीव इन पत्तियों से चिपक जाते है और पानी शुद्ध हो जाता है. आयुर्वेद में भी निर्गुन्डी की पत्तियों और बीजों का जल शुद्धिकरण में प्रयोग के बारे में बताया गया है. इसी प्रकार पातालकोट के हर्राकछार गाँव के आदिवासी नदी के किनारों पर छोटे-छोटे गड्ढ़े खोद कर उसमे नदी का पानी एकत्रित कर उसमे एक कप दही डाल देते है उनका मानना है की दही में भी सूक्ष्म जीवों को अपनी तरफ आकर्षित करने की क्षमता होती है और यह सही भी है की यह सूक्ष्म जीव दही में अपना भोज्य पदार्थ पाते है. कुछ समय बाद गड्ढों के पानी की सारी अशुद्धियाँ तल में बैठ जाती है और पानी पीने योग्य हो जाता है.. दीपक आचार्य का संपर्क है 9824050784

 This is a message of Deepak Acharya from Abhumka Herbals, Ahmedabad. In this message Deepakji is telling us tribal traditional method of water purification. He said tribal women’s of Patalkot valley fills drinking from water ponds situated at Rajkoh valley. This pond water is muddy and contains solid waste particles. Tribal woman’s is using Nirgundi (Vitex negundo) leaves to purify this water. For doing so first the pitcher is filled with this pond water then Nirgundi leaves filled up to slightly less than half of pitcher and it has to be left for an hour. Tribal believes Nirgundi is having properties to attract mud particles & microbes. About an hour later all impurities settled down at the bottom of the pitcher & tribal women’s then drawn surface water drinking & cooking purpose. In other method the tribal of “Harrakacchar” village of Patalkot dugs small pits at riverbank for collecting river water than adds one cupful yogurt to this water filled pit & after a while all impurities settled down at the bottom of pit & surface water can be used for drinking as well as for cooking purpose. Contact of Deepak Acharya is 9824050784

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वजन कम करने का पारंपरिक तरीका / Traditional method of reducing weight

यह संदेश श्री दीपक आचार्य का अभुमका हर्बल्स अहमदबाद से है. इस सन्देश में दीपकजी हमें मोटापा कम करने के पारंपरिक आदिवासी नुस्खे बता रहें है. पहला नुस्खा है लट्ठजीरा जिसे अपामार्ग भी कहते है (यह एक प्रकार की खरपतवार है जो प्रायः खेत खलियानों में उग जाती है जिसके बीज कपड़ों पर चिपक जाते है और जो जीरे सामान प्रतीत होते है) के बीजो को एकत्रित कर इसे मिट्टी के किसी पात्र में रखकर भून लें. यह भूने हुए आधा चम्मच बीज दिन के एक बार चबा-चबा कर खाएं. ऐसा करने से भूख कम लगती है और शरीर उर्जा की जरूरतों को पूरा करने के लिए शरीर में जमा चर्बी का उपयोग करने लगता है. दूसरा नुस्खा है आदिवासी मानते है की ज्यादा देर तक उबली हुई कड़क चाय पीने से भूख में कमी आती है. चाय में टैनिन नामक रसायन पाया जाता है जो भूख को कम करने में कारगर है. तीसरा नुस्खा है 1 किलो परवल को बारीक़ कांट लें और उसमे 400 ग्राम कोकम के फल डाल कर 4 लीटर पानी में उबालें. जब पानी एक चौथाई यानि 1 लीटर बच जाये तो इसे छान कर सुबह-शाम 100 मी.ली सेवन करने से शारीरिक वजन में कमी आती है. दीपकजी का संपर्क है 9824050784

This is a message of Deepak Acharya from Abhumka Herbals, Ahmedabad. In this message Deepakji telling us traditional tribal methods of reducing weight. He says as per tribal adiwasai method roast  Prickly chaff flower (Achyranthes aspera)  seeds in clay pan and eat these half table spoon seed every day. It is helpful for reducing appetite & body starts using stored fat to meet energy needs. In second method by using strong tea it is also useful for reducing weight because tea contains chemical called Tannin that is helping us to decrease appetite. Third method is boil 1 Kg Pointed gourd (well known as “Perval” in Hindi) & Kokkum (Garcinia indica) in 4 liter water until it remains one fourth (1 litre) after filtration take this combination in 100 ml quantity twice a day. It can helping to reduce excess body fat. Contact of Deepak Acharya is 9824050784

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प्राकृतिक डिओडोरेंट / Natural Deodorant

यह सन्देश डॉ. दीपक आचार्य का अभूमका हर्बल्स अहमदाबाद से है. इस सन्देश में दीपकजी हमें प्राकृतिक डिओडोरेंट बनाने की विधि बता रहे है. इनका कहना है की इस प्राकृतिक डिओरेंडोट को बनाने के लिए एक तिहाई कप सिरका (एसिटिक एसिड) और इतनी ही मात्रा में पानी लेकर इन दोनों को आपस में मिला ले. अब एक अलग बर्तन में 3 लौंग, धनिया, पुदीने की पत्तियाँ, 4-5 नीलगिरी की पत्तियाँ और थोड़ी सी दालचीनी को पहले से बनाये सिरके और पानी के गर्म घोल में डाल दे और थोड़ी देर बाद इसे छान ले. बस बन गया आपका प्राकृतिक डिओडोरेंट इसे किसी बोतल में भरकर फ्रिज में रखा जा सकता है. इसे नहाने के बाद थोडा सा लेकर बाँहों और ज्यादा पसीना आने वाले स्थानों पर लगाया जा सकता है. इससे पसीना आना तो कम होता ही है साथ ही यह दुर्गन्ध का नाश भी करता है. प्राकृतिक रूप से बने होने के कारण यह खतरनाक और केमिकल युक्त डिओरेंडोट से कई गुना बेहतर है..दीपकजी का संपर्क है 9824050784

This is a message of Dr. Deepak Acharya from Abhumka Herbals, Ahmedabad. In this message he is telling us method to prepare home made natural Deodorant. He says boil one third cup of Vinegar (Acetic acid) and water in equal quantity then add 3 cloves, coriander & mint leaves, little cinnamon and 4-5 eucalyptus leaves. After some time filter this preparation and fill it in the bottle & keep in refrigerator. Now your deodorant is ready. After bathing apply this natural deodorant on under arm and sweating parts of body to get rid of odor. contact of Deepak Acharya is 9824050784

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