Tag Archives: अकौआ / Calotropis gigantea

चर्मरोगों का पारंपरिक उपचार – Traditional treatment of Skin diseases

यह सन्देश वैद्य लोमेश कुमार बच का कोरबा, छत्तीसगढ़ से है. अपने इस सन्देश में लोमेशजी हमें चर्मरोगों के पारंपरिक उपचार के बारे में बता रहे है. इनका कहना है कि इस उपचार से दाद, खुजली, एक्जिमा आदि में लाभ मिलता है. इसके लिए बकायन की पत्तियों का रस 250 मी.ली., नीम की पत्तियों का रस 250 मी.ली., कनेर की पत्तियों का रस 250 मी.ली., महानीम की पत्तियों का रस 250 मी.ली. और अकौए जिसे मदार भी कहा जाता है इसकी पत्तियों का रस 100 मी.ली को लेकर तिल के तेल में पकाना है. जब सारा रस वाष्पीकृत होकर सिर्फ तेल ही बचे तब इस तेल को छानकर किसी शीशी में भरकर रख ले. इस तेल को चर्मरोग से ग्रसित अंग पर लगाने से लाभ मिलता है.

Vaid Lomesh Kumar Bach from Korba, Chhatisgarh is givng traditional remedy for skin diseases like Herpes, Eczema, Itching etc. In 500ml Sesame oil put 250ml juice of  Bakayan (Persian Lilac) leaves, 250ml  juice of Neem leaves, 250 ml juice of  Kaner (Oleander), 250 ml juice of Mahaneem leaves and 100 ml juice of Crown flower leaves and cook over slow fame till all juice evaporates. After filtration keep this oil in any bottle. Applying this oil on disease affected area is useful.

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गाठियावात का परंपरागत उपचार – Traditional treatment of Arthritis

यह सन्देश वैद्य हरीश चावड़ा का ग्राम गुंडदेही, बालोद, छत्तीसगढ़ से है. अपने इस सन्देश में हरीशजी हमें गठियावात के उपचार का पारंपरिक तरीका बता रहे है. इनके अनुसार 10 मदार की पत्तियाँ,  10 अरंड की पत्तियाँ और धतूरे की 20 पट्टियों को बारीक पीसकर उसका रस निकल लें. इस रस में रस से दुगनी मात्रा में सरसों का तेल और थोडा लहसुन मिलाकर इसे पकाएं. जब सारा पानी वाष्पीकृत हो जाए तो उस तेल को छानकर  किसी बोतल में सुरक्षित रख लें. इस तेल से गठिया से प्रभावित अंग की मालिश करने से लाभ मिलता है.

This message is from Vaid Harish Chawda of Balod, Chhatisgarh for peaople suffering from Arthiritis. Finely chopp and grind 10 Akaua (Calotropis gigantea) plant leaves, 10 Castor (Ricinus communis)  plant leaves and 20 leaves of Datura  (Stramonium) plant  and the squeeze out the juice. To this juice add about double amount of Mustard oil and boil it with some Garlic till all the water evaporates. After filtration keep this oil in any bottle. Applying this oil to affected body parts is beneficial.

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चर्मरोगों का पारंपरिक उपचार – Traditional treatment of Skin diseases

यह सन्देश वैद्य लोमेश कुमार बच का कोरबा, छत्तीसगढ़ से है. अपने इस सन्देश में लोमेशजी हमें चर्मरोगों के पारंपरिक उपचार के बारे में बता रहे है. इनका कहना है कि इस उपचार से दाद, खुजली, एक्जिमा आदि में लाभ मिलता है. इसके लिए बकायन की पत्तियों का रस 250 मी.ली., नीम की पत्तियों का रस 250 मी.ली., कनेर की पत्तियों का रस 250 मी.ली., महानीम की पत्तियों का रस 250 मी.ली. और अकौए जिसे मदार भी कहा जाता है इसकी पत्तियों का रस 100 मी.ली को लेकर तिल के तेल में इतना पकाना है. जब सारा रस वाष्पीकृत होकर सिर्फ तेल ही बचे तब इस तेल को छानकर किसी शीशी में भरकर रख ले. इस तेल को चर्मरोग से ग्रसित अंग पर लगाने से लाभ मिलता है.

This is a message of Lomesh Kumar Bach from Korba, Chhatisgarh. In this message he is telling us about traditional remedy for skin diseases like Herpes, Eczema, Itching etc. He says cook 250 ml Bakayan leaves juice (Persian lilac), 250 ml Neem leaves juice, 250 ml Kaner (Oleander), 250 ml Mahaneem leaves juice & 100 ml juice of Crown flower leaves in 500 ml Sesame oil until all juice evaporates. After filtration keep this oil in any bottle. Applying this oil on disease affected area is useful. 

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अस्थमा / दमे का परंपरागत इलाज / Traditional Treatment Of Asthma

इस सन्देश में डॉ. एच.डी गाँधी, डॉविजय चौरसिया जो कि गढ़ासराईजिला डिंडोरी मध्यप्रदेश से है का साक्षात्कार कर रहे है…. डॉचौरसिया पिछले 40 वर्षों से बैगा जनजाति की चिकित्सा पद्धति पर कार्य कर रहे है और इस विषय पर उन्होंने पुस्तकें भी लिखी हैइनका यह अनुभव रहा है की बैगा जनजाति के लोग वास्तव में बैगा वैद्य है जो अधिकतर मध्यप्रदेश के मंडला और डिंडोरी क्षेत्रों में बसते हैइनका मानना है भारतवर्ष में जड़ीबूटियों के मामलों में दो क्षेत्र ही अधिक प्रसिद्ध है एक हिमालय और दूसरा मध्यप्रदेश और छतीसगढ़एशिया महाद्वीप की पुरानी जन जातियों में से एक बैगा जनजाति इन्ही क्षेत्रों में सदियों से निवास करती आ रही हैती है… बैगा जनजाति के लोग सदियों से जंगल में मिलने वाली जड़ीबूटियों से इलाज करते आये है.. और यह अपने आप को सुषेण वैद्य के वंशज मानते है… यह बैगा जनजाति के लोग अस्थमा”  या दमा” जिसके बारे में कहा जाता है की दमा दम के साथ ही जाता है इसका इलाज बड़ी विश्वसनियता से जड़ी बूटी के माध्यम के से करते है… बैगा जनजाति की लोग इसके इलाज के लिए सफ़ेद अकौआ जिसे सफ़ेद मदार भी कहा जाता है इसके जड़काली हल्दीतुलसी की जड़ और अजवाइन का मिश्रण देते है जिससे पुराने से पुराना दमाश्वास एलर्जिक अस्थमा हमेशा के लिए समाप्त हो जाते है… डॉ चौरसिया का कहना है की इन्होने अभी तक अस्थमा की इस दवा से भारतवर्ष में 8-9 हजार लोगो का इलाज किया है और उन मरीजों के नाम और संपर्क नंबर भी इनके पास हैभारत के लगभग हर क्षेत्र में उनकी दवा का उपयोग हो चूका है और इसके लिए कोई विज्ञापन नहीं दिया गया सिर्फ मौखिक रूप से सुनकर लोग उनके पास इलाज करवाने के लिए आते है….

In this message Dr. Gandhi is talking to Dr. Vijaya Chourasiya of village Garhsarai, Distt. Dindori who tells us about traditional treatment of Asthma as practiced by primitive Baiga Tribe of Dist. Mandla in Chhatisgarh State. Dr. Chourasiya has been working for the last 40 years in this traditional method and has written many books on Baiga Tribe and their tribal treatment methods. According to him the Baiga Tribe is actually the Baiga Vaids who have settled in the Dindori and Mandla region of Madhya Pradesh. As per him the Himalayan range and the region of Madhya Pradesh & Chattisgarh are the two prime areas where there is abundance of herbal plants and roots. Baiga’s traditional healing of Asthma is by combination of Calotropis Gigantea (Madar), Black Turmeric, Basil plant root & Carom seeds and has been successfully used to treat oldest of ailments. Dr. Chourasiya is treating  Asthma for many year and about 8-9 thousand patients have benefited by his medicine. He also has names & contact numbers of treated patients. People have been coming to him purely on word of mouth publicity…

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पीलिया, हिचकी, प्रदर, रक्तप्रदर, स्वप्नदोष

यह संदेश निर्मल अवस्थीजी का कस्तूरबा नगर, वार्ड क्रमांक 4, बिलासपुर से है…उनका कहना है की पीलिया होने पर आक जिसको मदार भी कहते है की नयी कोमल कोंपले पीसकर मावे में मिलकर और उसने शक्कर मिलकर खिलाकर उपर से दूध पिला दे….यह चमत्कारिक ढंग से पीलिया को समाप्त कर देगी..अगर कोई कसर रह जाये तो इसे दवा लेने के तीसरे दिन भी एक बार दे दे…पीलिया जड़ से समाप्त हो जायेगा…दूसरी औषधि भी पीलिया के लिए ही है…100 ग्राम मुली के रस में 20 ग्राम शक्कर मिलकर पिलाये…गन्ने का रस, टमाटर और पपीते का सेवन करे…अगर किसी को हिचकी आती है तो मयूर पंख का चांदोबा जलाकर बनाई 2 रत्ती भस्म, 2 रत्ती पीपल चूर्ण को शहद में मिलाकर देने से हिचकी दूर होती है….प्रदर रोग में 100 ग्राम धनिया बीज 400 ग्राम पानी में स्टील के बर्तन में उबालें…आधा शेष रहने पर 20 ग्राम मिश्री मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें, 3-4 दिनों में लाभ होगा…रक्त प्रदर में 10 ग्राम मुल्तानी मिट्टी 100 ग्राम पानी में रात में भिगो दे, प्रातः इसे छान ले मिट्टी छोड़कर उस पानी को सोना-गेरू एक चम्मच फांक कर यह पानी पी लें…अगर सोना-गेरू नहीं हो फिर भी यह लाभ करेगा….स्वप्नदोष दूर करने के लिए बबूल की कोमल फलियाँ जिसमे बीज न आया हो उसे छाया में सुखा लें.. फिर उसे पीसकर चूर्ण बनाकर उसमे बराबर मात्र में मिश्री मिला लें….उसे सुबह-शाम एक-एक चम्मच लेने से स्वप्नदोष में लाभ होगा….निर्मल अवस्थी का संपर्क है: 09685441912

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नपुंसकता का उपचार

यह संदेश निर्मल कुमार अवस्थी का बिलासपुर, छत्तीसगढ़ से है…इसमें वह नपुंसकता का उपचार बता रहे है…इनका कहना है की अधिकतर नपुंसकता मानसिक और शारीरिक होती है…. इसके उपचार की औषधि बनाने के के लिए आक के पौधे का दूध इकठ्ठा कर ले फिर लगभग आधा किलो छुआरे लेकर उसे बीच में से काटकर उसकी गुठली निकाल दे और उसमे में आक का दूध भर कर उसे धागे से बांध दे…इसके बाद गेहूं का आटा गूंधकर एक गेंद बनाकर उन दूध भरे छुआरों को उसमे भरकर (जैसे कचौड़ी बनती है) सब तरफ से बंद कर दे…फिर उसे भट्टी में रख दे….जिससे उसकी भस्म बन जाये….यही औषधि है इस भस्म को 2-2 ग्राम सुबह-शाम गाय के दूध के साथ ले….इससे कमजोरी और नपुंसकता धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी…निर्मल अवस्थी का संपर्क है: 09685441912

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विभिन्न प्रकार के विष का उपचार

यह संदेश डॉ. एच.डी. गाँधी का धर्मार्थ दवाखाना, संजय नगर (रायपुर) छत्तीसगढ़ से है:

इस संदेश में डॉ. एच.डी. गाँधी का कहना है की अगर बिच्छु काटे स्थान पर अकौए (Calotropis gigantea) का दूध लगाने से लाभ मिलता है…काटे हुए स्थान पर पोटेशियम पेर्मेगनेट (Potassium Permanganate) या कार्बोलिक एसिड (Carbolic Acid) लगाने से लाभ होता है….तीसरा इमली का बीज पत्थर पर पानी से साथ रगड़कर दंश वाले स्थान पर लगाने से वह चिपककर सारा विष खीच लेता है….चौथा इन्द्रायण के फल का 5 ग्राम गुदा खाने से लाभ होता है….सांप काटने पर कालीमिर्च और प्याज़ पीसकर दंश वाले स्थान पर लगाये इससे प्याज़ का रंग हरा हो जायेगा…यह प्रक्रिया दोहराते रहे जब तक प्याज़ का रंग बदलना जारी रहे….सांप काटे स्थान पर अकौए (Calotropis gigantea) का दूध टपकाते रहे जब तक दूध कर रंग सफ़ेद न होने लगे….कनखजूरा काटने पर अकौए का दूध लगाने पर लाभ होगा.. यदि कनखजूरा चिपक गया है तो उस पर सरसों का तेल लगाये….मधुमक्खी के काटने पर तुलसी की पत्तियों को नमक में पीसकर लगाने से लाभ होगा….घर में लहसुन का चूर्ण पोटली में बांध कर रखने से चींटी-तिलचट्टे घर में नहीं आते है….भांग के नशे में दही पिलाने से लाभ होता है… तम्बाकू का नशा प्याज़ का रस 10 मी.ली. पिलाने से नशा उतर जाता है….मकड़ी का विष सौंठ और जीरा पानी में पीसकर लगाने से उतर जाता है…सूरजमुखी के 15 ग्राम बीज पीसकर खाने से सभी प्रकार के विष उतर जाते है….डॉ. एच.डी. गाँधी का संपर्क है 9424631467 है…

 

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