Tag Archives: नागरमोथा / Cyperus scariosus

बालों के झड़ने और सफ़ेद होने का पारंपरिक उपचार – Traditional treatment Grey & Hair loss problem

इस सन्देश में डॉ. एच डी गाँधी वैद्य अब्दुल रज्जाक से बालों को स्वस्थ्य बनाए रखने में उपयोगी तेल बनाने की विधि को जान रहें है. वैद्य अब्दुल रज्जाकजी का कहना है की इस तेल को बनाने के लिए 1 लीटर जैतून का तेल,  50 ग्राम आवंला, 100 ग्राम अमरबेल,  50 ग्राम जटामांसी, 50 ग्राम नागरमोथा, 50 ग्राम शिकाकाई और 50 ग्राम भृंगराज इन में से जैतून के तेल को छोड़कर सभी सामग्रियों को 2 लीटर पानी में उबालें और उबालकर पानी ¼ बचने पर इसमें 1 लीटर जैतून का तेल मिलाकर पकाएं और सारा पानी सूख जाने पर बचे तेल को किसी काँच की बोतल में सुरक्षित रख लें. पुरुष इसे तेल को 2-3 मी.ली की मात्रा में रोज और महिलाएं 10 मी.ली की मात्रा में सप्ताह में 2-3 बार लगाएँ तो इससे बालों का झड़ना असमय पकना कम होता है. 

 

In this message vaid H D Gandhi of Swasthya Swara is talking to another vaid Abdul Razzaq of Bhopal, Madhya Pradesh about making traditional oil effective in Hair loss & Gray Hair problems. For making this oil boil 50 gms Amla (Phyllanthus emblica), 100 gms Amarbel (Cuscuta), 50 gms Jatamansi (Muskroot), 50 gms Nagarmotha (Cyperus scariosus), 50 gms Shikakai (Acacia concinna) & 50 gms Brangraaj (False daisy) in 2 liter water & when ¼ water remains add 2 liter Olive oil to it. After all water evaporates store this oil after filtration in any glass bottle. Suggesting application quantity is 2-3 ml for gents daily & for ladies is 10 ml 2-3 days a week. It is very effective in Hair loss & Grey hair problems. 

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यकृत की दुर्बलता का पारंपरिक उपचार – Traditional treatment of Liver weakness

यह सन्देश रामप्रसाद निषाद का फरसगांव, कोंडागांव, छत्तीसगढ़ से है. अपने इस सन्देश में रामप्रसादजी हमें यकृत की दुर्बलता और सूजन का पारंपरिक उपचार के बारे में बता रहे है. इनका कहना है कि इसके उपचार के लिए जटामांसी और नागरमोथा के चूर्ण को बराबर मात्रा में मिलाकर इसे सुरक्षित बोतल में भरकर रख लें. इसे 1-1 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम ठन्डे पानी से देने से लाभ मिलता है. 50 चने को पकाकर उसमे स्वादानुसार नमक मिलाकर 5 दिनों तक प्रतिदिन सुबह खिलाएं 5 दिनों के बाद चने को घी में भुनकर लगातार 20 खिलाएं इस प्रकार करने से यकृत को बल मिलता है. रामप्रसाद निषाद का संपर्क है 7879412247

This is a message of Ramprasad Nishad from Farasgaon, Kondagaon, Chhatisgarh. In this message he is suggesting use traditional treatment of Liver weakness & swelling. He says grind Muskroot & Nutgrass in equal quantity to make powder & Keep it in any airtight bottle. Taking this powder in 1 spoon quantity twice a day with cold water is useful in Liver weakness. Cook 50 gms Gram and add salt to taste. Taking this cooked grams daily for 5 days & after 5 days ghee roasted grams to be taken for 20 days is beneficial for Liver. Ramprasad Nishad is @ 7879412247

 

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कब्ज का पारंपरिक उपचार – Traditional treatment of constipation

यह सन्देश वैद्य हरीश चावड़ा का गुंडरदेही, जिला बालोद, छत्तीसगढ़ से है. अपने इस सन्देश में हरीशजी हमें कब्ज के उपचार का पारंपरिक नुस्खे बता रहे है. इसके उपचार के लिए काकड़ासिंघी, अतीस, पीपर, नागरमोथा, सनाय की पत्तियां, जवाखार और वायविडंग इन सभी को सामान मात्रा में पीसकर बारीक चूर्ण बनाकर रख ले. प्रतिदिन भोजन करने के पश्चात ½ चम्मच यह चूर्ण गुनगुने पानी के साथ लेने से कब्ज में आराम मिलता है. निशोथ, अजवाइन, वायविडंग, सौंठ, काला नमक, कालीमिर्च, छोटी हरड इन सभी को 10-10 ग्राम की मात्रा में लेकर उसमे 40 ग्राम सनाय के पत्तियाँ मिलाकर बारीक पीसने के बाद कपडे से छान कर रख ले. इस चूर्ण को रोज रात्रि भोजन के बाद ½ चम्मच की मात्रा में लेने से कब्ज में लाभ मिलता है. आक (मदार) की जड़ को छाया में सुखाकर इसका चूर्ण बना ले. इस  ½ चूर्ण को गर्म दूध में मिलाकर लेने से भी कब्ज में लाभ मिलता है. हरीश चावड़ा का संपर्क है 9893765366

This is a message of vaidya Harish Chawda from Gundardehi, Dist. Balod, Chhatisgarh. In this message he is suggesting some traditional tips for the treatment of constipation. He says in case of constipation grind Kakda singi (Pistacia chinensis), Indian Atis (Aconitum heterophyllum), Piper longum, Nagarmotha (Cyperus scariosus), Senna leaves, Javakhar, False black pepper in equal quantity & keep this combination in any bottle. Taking this powder in  ½ tea spoon quantity twice a day after meal with lukewarm water is useful. Grind Indian jalap, Carom, False black peeper, dry ginger, black salt, black pepper & Terminalia chebula in 10 gram each in  & senna leaves in 40 gms quantity & after cloth filtration taking this  ½ table spoon combination after dinner is useful. Grind shadow dried root of crown flower tree & taking this  ½  table spoon powder after mixing in lukewarm milk is beneficial. Harish Chawda 9893765366 

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यकृत रोगों का पारंपरिक उपचार / Traditional treatment of Liver diseases.

यह सन्देश रामप्रसाद निषाद का कोंडागांव, बस्तर, छत्तीसगढ़ से है. अपने इस सन्देश में रामप्रसादजी हमें हमारे शरीर में यकृत के महत्व और उसके रोगों का पारंपरिक उपचार के बारे में बता रहें है. इनका कहना है मानव शरीर में यकृत रक्त के निर्माण में महती भूमिका निभाता है. ऐसे में यकृत सम्बंधित रोग घातक सिद्ध हो सकते है. अगर यकृत में कोई विकार आ जाता है तो शरीर में कई दोष उत्पन्न हो जाते है. यकृत के ठीक रहने पर ही स्वस्थ रहा जा सकता है. यकृत के रोग होने पर उसके निदान में देरी नहीं करनी चाहिए. इसका पारंपरिक उपचार है बालछड और नागरमोथा को सामान मात्रा में पीसकर किसी बोतल में भर लें. इसको 1-1 ग्राम मात्रा में सुबह, दोपहर और शाम को ठन्डे पानी से कुछ दिन लेते रहने से यकृत रोगों में लाभ मिलता है. यकृत रोगों में गर्म, खट्टी, तैलीय वस्तुयें, चाय, मांस, और मदिरापान से बचना चाहिए. सुपाच्य भोजन लें. रामप्रसाद निषाद का संपर्क है 7879412247

This is a message of Ramprasad Nishad from Kondagaon, Bastar, Chhatisgarh. In this message Ramprasadji telling us importance of Liver & traditional treatment of Liver diseases. He say’s Liver is very important organ of human body. Liver plays an important role in blood production. We can stay healthy if our Liver is healthy. In case of Liver disease delay in treatment is harmful. Traditional treatment of Liver disease is grind Balchad (Also known as Jatamansi) & Nagarmotha by taking in equal parts & store in air tight container. Taking this powder 1-1 gms thrice a day for few days. This medicine is useful for Liver diseases. Avoiding hot, oily products, tea & alcohol. Ramprasad Nishad’s at 787412247

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अडूसा के औषधीय गुण / Medicinal Properties of Adhatoda vasica

यह संदेश लोमेश कुमार बच का लिमरू वन औषधालय, जिला कोरबा, छतीसगढ़ से है. इस संदेश में वह अडूसा जिसे वासा भी कहा जाता है. इसका पौधा 4 से 10 फीट तक ऊँचा होता है और इसके पत्ते 3 से 8 इंच लम्बे होते है. इसके फूल सफ़ेद रंग के होते है. यह दो प्रकार का होता है श्वेत वासा और श्याम वासा पर श्वेत वासा ही बहुतायत में पाया जाता है…वासा का गुणधर्म उत्तम उत्तेजक, कफ निसारक, आक्षेपकहर है इसका फूल उष्ण, कडवा, ज्वराग्न और रक्त की उष्णता और मांसपेशियों के खिचाव को कम करने वाला होता है.

इसके औषधीय उपयोग हेतु इस पौधे के विभिन्न भागो की अनुशंसित मात्रा इस प्रकार है:

1. पत्र का स्वरस (पत्तियों का अर्क) 1-2 तोला

2. मूल तत्व चूर्ण (जड़ों का चूर्ण) 2-5 रत्ती

3. मूल क्वाथ को 4-8 तोला

इसका प्रयोग कई रोगों के निदान के लिए किया जाता है. उनमे से नया पुराना फुस्फुस रोग, जिसे (ब्रोंकाइटिस) भी कहते है, के उपचार के लिए इसके पत्ते, कंठकारी (जिसे भट्टकटैया भी कहते है), नागरमोथा और सौंठ को समभाग मिलाकर काढ़ा बनाकर 4-8 तोला तक दिया जाता है.

रक्तपित्त, में जिसमे नाक से या खांसी से खून आता है, के उपचार के लिए इसकी पत्तियों का रस शहद में मिलाकर दिया जाता है. बच्चों की कुकूर खांसी में इसकी जड़ का काढ़ा बनाकर देने से कुकूर खांसी और ज्वर में आराम मिलता है. शरीर पर फोड़ा होने पर वाचा की पत्तियों को पानी में पीसकर उसकी लुगदी फोड़े पर लगाने से फोड़ा बैठ जाता है. हाथ-पैरों की ऐंठन और वेदना होने पर वाचा के पत्तियों का रस 500 मी.ली और तिल का तेल 250 मी.ली को पकाकर तेलपाक होने पर इस तेल की मालिश करने से लाभ होता है.

लोमेशजी से संपर्क 9753705914 पर कर सकते है.

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